लेखक -डॉ. उदयवीर शर्मा सम्पादक- गोपीराम मुरारका
रूप निखारै थारलो, धन धन रजवट राग !!२७
अंतर मन कंवलो घणो, सराबोर रस राग !
वीर संस्कृति रा धणी, अरियां ताणी नाग !!२८
मुखड़े सू मोती झडे, नैणा बरसै नेह !
निरमल हिड़दो रस भरयो, बरसै इमरत मेह !!२९
सीधा सादा विनय नत, आतम भाव अनूप !
परहित साधक विमल मत, सुरजन सुर-जन रूप !!३०
रजपूती राखी अटल, सत रै काज अनूप !
राष्ट्र धरम ने धारियों, जीवन रस रै रूप !!३१
धरम करम रजपूत रा, सत री लियां उमंग !
झेल्यो भोग्यो जुझिया, आजादी रै रंग !!३२
धाकड़ वाणी गूंजती, गातां डिंगल गीत !
जोश उमड्तो डील में, रजवट रस रा मीत !!३३
बलिदानी जीवन जियो,जुझारां रै साथ !
आजादी तांई लड्या, करिया दो दो हाथ !!३४
दिवलो बण राखी अटल, आजादी री जोत !
जुझारी रस धार में, कुद्या नहाया भोत !!३५
काव्य और इतिहास रो, संगम घणो अनूप !
सुरजन हिवडे ओपरयो, रजपूती रो रूप !!३६
( ५ )
सुरसत रो साधक धुनी, रजपूती गुण खान !
दोनू रूप सुहवणा , धीर वीर मती मान !!३७
कण कण सूं सत उझलै, रज रज में रण वीर !
दानी मानी दृढ़ व्रती, सेखा कुली सुधीर !!३८
वीर घराणो वीर मन, कुल गौरव सूं लाड !
जद हा पन्द्रह बरस रा,पढ़ियो कर्नल टाड !!३९
पुरखा रै इतिहास रो, बचपण सूं हो चाव !
पढयो गुण्यो मंथन करयो, पड्यो सरस प्रभाव !!४०
खरवा राव गोपाल सिंह, आजादी रै जंग !
जुझ्या ब्रिटिश राज सूं, थे हा बां रै संग !!४१
अथक लेखनी अटल मन,अडिग लगन अणपार !
थां सा थे ही सूरमा, सत साहित संसार !!४२
उजलायो कुल गोत नै, शेखा कुल इतिहास !
ज्ञान जोत नित जगमगे, दीपे घणो उजास !!४३
समझ्यो परख्यो ज्ञान सूं, मिनख पणे रो मोल !
धरम करम सत भाव सूं, लिन्यो हिवडे तोल !!४४
उजलायो निज ज्ञान सूं,जलम भोम रो नाम !
शेखा कुल री कीरति,सुरजन सूं सरनाम !!४५
सुरसत रो सेवक अटल,इतिहासां री जोत !
शेखा कुल रो लाडलो, उजलो रूप उदोत !!४६
थारै अंतर मन रमी, मरुधर मीठी राग !
जलम भोम हिवडे बसी,कण कण सूं अनुराग !!४७
तपसी साधक गुण धणी, ज्ञान वीर गतिमान !
मरुधर रै रस में रम्यो, संस्कृति कला निधान !!४८
जीवन पथ रा जातरी,सिर पर सत री पोट !
थरप्या ऐडा ज्ञान रा, मथ मथ काढयो खोट !!४९
सुरजन सुरसत लाडलो,आतम रस लवलीन !
अपणी मझ में झूमणो, तन मन सूं स्वाधीन !!५०
( ६ )
शेखावाटी रो रतन, कुल रो गौरव-गान !
दिव्य लोक सूं उतरयो, ले उजलो वरदान !!५१
डुबकी खा आध्यत्म में, हुयो मगन रस लीन!
आतम रस मन मोद सूं,पायो सदा नवीन !!५२
अट्क्या भटक्या फिर बढया, आयो ज्ञान निखार !
जुड्या दिव्य संगीत सूं, मन वीणा रा तार !!५३
सुरजन बोल सुहावणा, उपजावे अनुराग !
निरमल हिड्दै रा धणी, मिलै कदै बड़ भाग !!५४
निरमल थारी साधना, निरमल थारो रूप !
निरमल थारी भावना, निरमल भाव अनूप !!५५
दिव्य देश सूं उतरया, लियां दिव्य संदेश !
सत पुरखा रो देश यो, म्हारो मरुधर देश !!५६
सुरजन थाने के कवां, महिमा अमित अपार!
थां सा तो थे ही गुणी,काढयो इमरत सार !!५७
साधना
शेखावाटी रो सुजस, करयो आप विख्यात !
विदवाना रै जगत में, नित उठ चाले बात !!५८
महिमा थारे ज्ञान री, गुणिया रो आनंद !
राजस्थानी सम्पदा, थां सूं ही बणी बिलंद !!५९
भुज बल मन बल धरम बल, थां में भरयो अखुट !
थारी सुरसत साधना, लूंठी दिव्य अटूट !!६०
साहित थारी साधना, गुण थारो इतिहास !
जीवन रस में घोलरया, मंगल मोद हुलास !!६१
( ७ )
गुण ग्राही सेवक विमल, रचना धरमी धीर !
किनी इमरत साधना, रंग रै सुरजन वीर !!६२
सुरजन थारी साधना, अविचल जीवन राग !
सुरसत रै वरदान सूं, उजलयो थारो भाग !!६३
थे फैलायो ज्ञान निज,धोबा भर भर बाँट !
ज्यूँ जीवन रस उमड्यो,बादल छोड़े छांट !!६४
लिखरया सन चालीस सूं,शोध खोज रा लेख !
अपणो पद थरप्यो सहज,खीच ज्ञान री रेख !!६५
नाना विध लिखिया सरस,घणा लुभाणा लेख !
साहित जग आदर दियो,सत रो सिरजण देख !!६६
घण मोली तथ्यां भरी, पोथी 'शेखो राव' !
कुल कीरत री रागनी,थे गाई मन-चाव !!६७
खोजी शोध सवांर कै, पोथी 'मांढ़ण युद्ध' !
प्रगटी साहित सम्पदा, थे हो घणा प्रबुद्ध !!६८
महिमा थारी गूंजरी, नवल नगर इतिहास !
ज्ञान जोत दिपै करे कीरत-भवन उजास !!६९
ख्यात बात इतिहास में, थारी पैनी दीठ !
साहित रो पख उजलो, रंग सुरंग मजीठ !!७०
शिला लेख प्रगटाया , बांच- बांच नै बांच !
सत प्रगट्यो इतिहास रो, कर कर फिर फिर जाँच !!७१
आद्कल सूं इब तलक , शेखा घर इतिहास !
सांचो सबलो मांडियो, फैल्यो ज्ञान ऊजास !७२
शेखा घर री जस कथा, थे गुंथी गुण भेद !
मानो थरप्या घण सजल, कुल कीरत रा वेद !!७३
वेदां री भूमि विमल, सदा साधना लीन !
मरुधर में शेखा धरा, उजलयो जस प्राचीन !!७४
एक कड़ी इतिहास री, जगमग 'रायसल्ल' !
ज्ञान धजा लेकर खड्यो, कीरत खंभ अचल्ल !!७५
( ८ )
जूनी गुथ्याँ सुलझगी, जुड्यो तार सूं तार !
लिख इतिहास लुभावणा, जस पायो अणपार !!७६
मंथन कर इतिहास रो, काढ्या रतन अनूप !
उजलायो कुल गोत नै,सुरजन साहित भूप !!७७
मौन साधना रत धुनी, वाणी सबद रसाल !
बांटयो घण इतिहास रस, सुरजन करयो कमाल !!७८
सहज सनेही विमल मन, ज्ञानी गुणी विशाल !
पर हित साधक विनय नत,सत री करी संभाल !!७९
इतिहासां री जस कथा, गाई घणी अनूप !
सुरसत रे परताप सूं, निखरयो आतम रूप !!८०
शेखा गर कीरत कथा, जग सूं कदै न जाय !
सरस उजाली थोक में, हरख हरख हरखाय !!८१
अपणी कुल कीरत करी,सुरजन जग विख्यात !
धजा फरूकै गगन में, जुग जुग चाले बात !!८२
कीरत शेखा- कुल धरा,भारत में विख्यात !
सुरजन किधि कलम सूं,जुग जुग चालै बात !!८
जूनी पोथ्यां सांवठी ,पढ़ी खोलियो भेद।
आदकाल सूं जोड़ियों ,शेखा कुल रो वेद।।८४
शेखावाटी हित तपै ,सुरजन गुणी सपूत।
समझयो जीवण सार नै ,यो सांचो अवधूत।। ८५
लिखियो जूनो सांवठो ,जलम भौम इतिहास।
धन है थारी लेखनी ,शेखावाटी - व्यास।। ८६
नित पोथ्यां रै ढेर बिच ,ओपै व्रती उदार।
ज्यूँ तारा बिच चन्द्रमा ,किरणा लिया अपार।। ८७
सुरसत रै परिवार में ,इतिहासां री बात।
थां सूं ही पूरी हुवै ,शेखा घर विख्यात।। ८८
गौरव गरिमा सूं भरयो ,भारत रो इतिहास।
थां नै दिनी प्रेरणा ,मन में घणो हुलास।। ८९
मन रमियो इतिहास में, जीवन रो रसमान।
आन बान सूं थे कथ्यों ,पुरखां रो गुणगान।। ९०
पोथ्यां पढ़ पढ़ सैंकड़ी ,पायो आतम बोध।
काळजयी पुरखा हुया ,किन्यो प्रबल प्रबोध।। ९१
अणथक चालै लेखनी ,तन बुढो मन जोश।